भौर से ही ख़्याल है ,
तू ही याद क्यूँ -
उलझता हुआ सवाल है।
कल तक सब सही था,
दिमाग़ की उपज भी बेमिसाल है।
रात चंदा से भी चाँदनी बोली -
मैं भी हूँ गर्दिश में,
फिर क्यूँ सूरज की रोशनी कमाल है
।
पल - पल की याद भी नई सुबह का दीदार है ,
कहीं सुनील तुझे भी होने लगा प्यार है ।
वक़्त-बेवक़ूफ़-बेवाक करता नया काम है,
ख़ुद से खुदी तक आज का कलाम है ।
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