शनिवार, 21 जनवरी 2017

दिमाग़ की उपज भी बेमिसाल है।

भौर से ही ख़्याल है , 

तू ही याद क्यूँ -

 उलझता हुआ सवाल है।

 कल तक सब सही था, 



दिमाग़ की उपज भी बेमिसाल है। 

रात चंदा से भी चाँदनी बोली - 


मैं भी हूँ गर्दिश में, 


फिर क्यूँ सूरज की रोशनी कमाल है 
पल - पल की याद भी नई सुबह का दीदार है ,



 कहीं सुनील तुझे भी होने लगा प्यार है ।

वक़्त-बेवक़ूफ़-बेवाक करता नया काम है, 


ख़ुद से खुदी तक आज का कलाम है ।

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