तेरे ही दीदार को तरसता हूँ , शायद तुझसे प्यार भी करता हूँ।
महल नहीं है कोई खाबों का, वास्तविकता में ना सही याद तो करता हूँ।
तुझे ख़याल भी नहीं, किस क़दर जलता हूँ .नासमझी ही सही, तुझपर ऐतवार करता हूँ।
क़लम की नौक भी चुभने लगी है अब. नीव मेरे सवालों की आधार ज़िंदगी को रखता हूँ।
कई दबे पड़े हैं जवाब जिसमें. वो किताब सरेआम रखता हूँ।
सोचना मत सुनील जो गुज़र गया. जो है साथ रहेगा अंत तक :- आने वाले पल पर यही विश्वास रखता हूँ ।
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