रूह - ए - कलम
क्या करूँ ! अपना ही तो है जग सारा
फिर भी क्यों तलाशूं कोई सहारा ,
आसमान सी हो सोच अपनी
बिना पंख हवा के सहारे -
घूमना चाहूँ जग सारा ,,
क्या करूँ ! सीमाएं है -बाधाएं हैं
गले मिलना तो चाहूँ
जो रहते है अपने उस पार
कंटीली तारों को लाँघ कर
जा नहीं सकता उनके द्वार
'सुनील' बदलेगा वक़्त
बदलते पन्नो के साथ
रूह को भी मिलेगा इन्साफ
वस ! चल अभी इंतज़ार करें
कलम की तरह जिसे पन्नो का सहारा।
क्या करूँ ! अपना ही तो है जग सारा
फिर भी क्यों तलाशूं कोई सहारा ,
आसमान सी हो सोच अपनी
बिना पंख हवा के सहारे -
घूमना चाहूँ जग सारा ,,
क्या करूँ ! सीमाएं है -बाधाएं हैं
गले मिलना तो चाहूँ
जो रहते है अपने उस पार
कंटीली तारों को लाँघ कर
जा नहीं सकता उनके द्वार
'सुनील' बदलेगा वक़्त
बदलते पन्नो के साथ
रूह को भी मिलेगा इन्साफ
वस ! चल अभी इंतज़ार करें
कलम की तरह जिसे पन्नो का सहारा।
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