मेरी जिंदगी
मेरी कलम मेरी ही
परिभाषा
जिसकी रंग बिरंगी
स्याही
सफेद पन्नो पर छपी
हुई भाषा....
यूँ ही लिखता जाऊंगा
पल पल
हरपाल
अपने आप में मिलता
जाऊंगा
क्या जिंदगी पाई है मैंने
अपने दर्द ..
खुद ही लिखता जाऊंगा
....
शायद है जो मेरी
अक्षर ए दास्ताँ पास
मेरे
अपने हरे जख्मो पर
खुद ही मरहम लगता
जाऊँगा ...
पास है नहीं मेरे कुछ
खास
सिबाय प्यार के
जिसने भी गले लगाया
उसे दोस्त बनाता
जाऊंगा
मिटटी में मिलने से
पहले
छाओं देकर यादों की
होठों पर मुस्कराहट
नयन से बहा काज़ल ले
जाऊंगा ...
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