गुरुवार, 22 नवंबर 2018

2019 चुनाव: धर्म के आधार पर राज की नीति


सत्ता के लिए सरकार कुछ भी करेंगे, और वोटबैंक को बढ़ाने के लिए अपनी जेब से पैसा खर्च हो या किसी और की जेब से फर्क जनता की ही पढ़ेगा. ये बात छुपी किसी से नहीं लेकिन कबूल भी कोई नहीं करता. सच में हमारे समाज की कैसी बिडंबना है, अब जो खर्चा सरकार की और से किए जाता है  वो टैक्स या किसी न किसी रुप में बसूल कर ही लिया जाता है. इसमें कोई हानि भी नहीं क्योंकि समाज के विकास के लिए हम सब भागीदार हैं, हमारा पैसा जो भी वसूला जाता है हमारे और समाज की भलाई के कामों में लगया जाता है, लेकिन ये बात भी सही है कि - बाप बड़ा भाई न भईया सबसे बढ़ा रुपईया- चलिए अब पैसे के बिना वर्तमान में कोई काम वैसे होता नहीं लेकिन ये भी झूठ है किसी को दिलासा देना हो या कोई सपना दिखाना हो तब उसके लिए पैसों की जरुरत नहीं पड़ती, आप बोली जाओ और सामने वाला अगर समझदार होगा तब वो लपेटता जाएगा.
बहरहाल यही अब भारत की रातनीति में चरम पर है वर्तमान में यही कह सकता हूं. यानि सत्ता हासिल करने के लिए सियासत दान कुछ भी कहेंगे. और हम सुनेंगे
चलो कोई बात नहीं खूबसूरत रन और बड़ी पंड दोनों को संभालना काफी मुश्किल है,  हर किसी की नजर इसपर रहती है और हर किसी को आसानी से याद भी. हां- अब यही देश के राजनीतिक गलियारे में हो रहा है. केंद्र की भाजपा सरकार का कभी मैनिफैस्टो उठा कर देखिए- पंड काफी बढ़ी थी और तभी आज शायद जनता को सब याद है, भई पब्लिक है अब सब जानती है. लेकिन ये मानती कैसे है ये हमारे सियासतदान काफी गहराई से जानते हैं. इसमें कोई दोराय नहीं कि जनसेवक जहन में यही सोचते होंगे कि सारा दिन तो जनता के बीच रहते हैं, जनता की रग-रग से बाकिफ हैं, और शायद इसलिए अब रग को पकड़ कर 2019 को लिए राजनीतिक दल पैमाना सैट कर रहे हैं.

हर पार्टी हर किस्म का मशाला डाल रही है ताकि 2019 के राजभोग में कोई कमी न रहे. राजनीति के अखाड़े में जब भी जोर की बात चलती है तब मूल कांग्रेस और भाजपा पर आकर खड़ा हो जाता है, हां भारत के कुछेक राज्यों में क्षेत्रिय पार्टियों का दबदबा है, पर वर्तमान में जिन राज्यों में कांग्रेस या भाजपा की सरकार है उनके मैनिफैस्टो की लाइने जनता के दरबार तक नहीं पहुंची. यानि जो कभी नेताओं की जुवान से सुनी थी वो सेवाएं प्रदान अभी भी हो नहीं सकी कुछेक पर काम चल रहा है, कुछेक हुई है लेकिन अजाम अभी पहुंची नहीं, और कुछेक बातों पर काम आने वाले दिनों में शुरु हो ही जाएगा,. चलिए कोई न - कभी कभी खुद का काम बीच में छोड़ कर भी उठना पड़ता है, इतना ही नहीं कभी-कभी रीज से किया काम भी राज बनकर रह जाता है. पर अब राजनीति में कुछ राज नहीं आज नहीं तो कल आंकड़ों के साथ हिसाब हर बात का हो जाता है. लेकिन धर्म के आधार पर 2019 का चुनाव अधर में लटका हुआ नजर सा आ रहा है. राम जन्म भूमि पर राम मंदिर निर्माण कब होगा तय नहीं, भाजपा फिर से इसी रेखा पर चल रही है. कि मंजिल शायद अब राम मंदिर निर्माण के नाम पर मिल जाए. हम नहीं कह रहे वर्तमान की राजनीति का परिवेश यही दिखा रहा है.  दुनिया के सबसे पुराने धर्म में धार्मिक विचारों के आधार पर राजनीति का खेल लेकिन अब यही खेल सिख धर्म में भी दिखने लग पड़ा है. श्री करतारपुर साहिब कोरिडोर को लेकर अब राजनीति इसपर भी चरम पर होने लगी थी, कुछ दिन पहले तक सियासी हुक्मरान नवजोत सिंह सिद्धू को खरी-खरी सुना रहे थे, लेकिन अब जब केंद्रीय कैबिनेट ने फैसला सुनाया है तो काम की तारीफ हो रही है, लेकिन कुछ दिन बाद अब इस नाम से सियासी दलों में डिबेट भी शुरु हो जाएगी. क्योंकि राजनीतिक दल अब सिद्धू के हाथ और भाजपा के साथ की बात कहेंगे, कि भई हमने इसे अंजाम दिया, पर इसी बीच अकाली दल कोरिडोर को लेकर विसात बिछाने की बात कहेगा, इसमें कोई दोराय नहीं, बात दिल्ली में दिख ही चुकी है, जब केंद्र के फैसले के बाद अकाली प्रधान और केंद्रीय मंत्री ने प्रैस कान्फ्रैंस की. हिंद के चक्कर में लेकिन इस दौरान भाषण में बादल साहब की जुवान फिर गोते खा गई, लेकिन 2019 के में गोते लगा रहे राजनीतिक दलों में से अब किसकी नैया जनता पार लगाती है यह सब धर्मों से उपर इंसानियत के धर्म पर निर्भर करता है. चलिए देखते हैं देश की राजनीति किस दिशा में चलती है और क्या नया रंग दिखाती है.

सोमवार, 19 नवंबर 2018

Hello : नमस्कार, कितने दिन पहले बोला था, शायद हमें याद भी नहीं ?



Are u ashamed to say greetings #Namaste 

नमस्कार, कितने दिन पहले बोला था शायद हमें याद भी नहीं ? Hello _ Good Morning  या किसी और भाषा विस करने का शब्द अलग होगा, लेकिन सलीके में अब घूटन सी देखी है. किसी को इतना संकोच क्यों, प्रत्यक्ष है लेकिन इस संकोच का प्रमाण नहीं, वैसे अब छोटों और बढ़ो को गुडमोर्निंग और हैलो के अलावा किसी शब्द का ज्ञान नहीं, हैलो के इंग्लिश में ट्रांसलेट करने के जरुरत नहीं, आप खुद भी कर सकते हो, ताकि व्यक्तिगत तौरे इसका मतलब समझ आए .
अच्छा एक बात ये भी है चैटिंग या फोन कॉल के अलावा हैलो हम बोलते ही नहीं, लेकिन अब हैलो के पीछे भी हर किसी का अपना एक हित छिपा हुआ. मेरा या आपका भी शायद, और सच यही है कि हम जिंदगी की मशरुफियत में अपने साथ ही मजाक कर रहे हैं. अपने बंधू ( छोटा-बड़ा करीबी ) को विस तो कर रहे हैं. लेकिन बस काम के लिए, या फिर बोरियत को खत्म करने के लिए. क्योंकि हैलो तो हमने अपना लिया निंकोच बोल भी दिया, लेकिन इसके मतलब को हमने ताक पर ऱख दिया.
अब इस बात में भी कोई दोराय नहीं और न ही इसपर कोई पर्दा की हमें नमस्कार या नमस्कारम बोले कितना वक्त हो गया होगा. सच में ना- हैलो साधारण है, कभी कबार किसी से मिलने पर बोल ही देते हैं, लेकिन नमस्कार, प्रमाण, जैसे शब्दों को हमने शमसान में ही रख दिया है, बस चिता ही सेज सजाना बाकि है. अब चिंता नहीं चिंतन है कि हाथ जोड़ने पर भी हम अपने अंदर एक अजीब सी घुटन महसूस करते हैं.
ये घुटन कैसी, हाथ जोड़ कर देखिए तो सही, अजीब सा लगेगा, फालतू का ड्रामा ये भी नहीं कह सकते कि ये ड्रामा अब स्क्रीन पर सही लगता है क्योंकि कुछेक न्यूज एंकर या रीडर ही होंगे जो आदर सहित हाथ जोड़ कर कहते हैं  ' नमस्कार '
      No Indian has ever explained the meaning of #NAMASTE in such a beautiful way !!

'नम:' धातु से बना है 'नमस्कार'। नम: का अर्थ है नमन करना या झुकना। नमस्कार का मतलब पैर छूना नहीं होता। नमस्कार शब्द हिन्दी, गुजराती, मराठी, तमिल, बंगाली आदि वर्तमान में प्रचलित भाषाओं का शब्द नहीं है। यह हिन्दू धर्म की भाषा संस्कृत का शब्द है। संस्कृत से ही सभी भाषाओं का जन्म हुआ।
हिन्दू और भारतीय संस्कृति के अनुसार मंदिर में दर्शन करते समय या किसी सम्माननीय व्यक्ति से मिलने पर हमारे हाथ स्वत: ही नमस्कार मुद्रा में जुड़ जाते हैं। नमस्कार करते समय व्यक्ति क्या करें और क्या न करें इसके भी शास्त्रों में नियम हैं। नियम से ही समाज चलता है।

1 सामान्य नमस्कार : किसी से मिलते वक्त सामान्य तौर पर दोनों हाथों की हथेलियों को जोड़कर नमस्कार किया जाता है। प्रतिदिन हमसे कोई न कोई मिलता ही है, जो हमें नमस्कार करता है या हम उसे नमस्कार करते हैं।

2 पद नमस्कार : इस नमस्कार के अंतर्गत हम अपने परिवार और कुटुम्ब के बुजुर्गों, माता-पिता आदि के पैर छूकर नमस्कार करते हैं। परिवार के अलावा हम अपने गुरु और आध्यात्मिक ज्ञान से संपन्न व्यक्ति के पैर छूते हैं।

3  साष्टांग नमस्कार : यह नमस्कार सिर्फ मंदिर में ही किया जाता है। षड्रिपु, मन और बुद्धि, इन आठों अंगों से ईश्वर की शरण में जाना अर्थात साष्टांग नमन करना ही साष्टांग नमस्कार है।

नमस्कार के लाभ : अच्छी भावना और तरीके से किए गए नमस्कार का प्रथम लाभ यह है कि इससे मन में निर्मलता बढ़ती है। निर्मलता से सकारात्मकता का विकास होता है। अच्छे से नमस्कार करने से दूसरे के मन में आपके प्रति अच्छे भावों का विकास होता है।इस तरह नस्कार का आध्यात्मिक और व्यावहारिक दोनों ही तरह का लाभ मिलता है। इससे जहां दूसरों के प्रति मन में नम्रता बढ़ती है वहीं मंदिर में नमस्कार करने से व्यक्ति के भीतर शरणागत और कृतज्ञता के भाव का विकास होता है। इससे मन और मस्तिष्क शांत होता है और शीघ्र ही आध्यात्मिक सफलता मिलती है।

अब इतना ज्ञान हासिल करने के बाद भी हैलो में वो मजा नहीं शायद जो नमस्कार में है. 

#Namaste!!! Please be proud about it !!!!!! It’s a profound statement to greet someone !!! Please get educated

नमस्कार

शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

चांद झोल न कर, प्यार में मखौल न कर

किसी को इच्छा है चांद छूने की 
किसी को चांद पाने की
किसी के लिए कोई चांद
किसी को इंतजार दिदार हो जाने की

गर्दिश- ए- चांद ठहरा कहां
दिल-ए-दिमाग अब पहरा कहां
चांद सी चमक किसे नहीं चाहिए
सूरज की दमक सा चेहरा वहां


उमड़-घुमड़ कर आते विचार
कब लगेगी नइया पार
लहरों में गोते खाता इज़हार
डूब ही जाएगा गहरा ये प्यार

पटल पर देखा है पानी के
दिखती है छवि चांद साथ चांदनी के
सूरत के बाद सीरत ही दिखी
अब क्या बदलने पन्ने ज़िंदगानी के

चल अब मोल न कर
वजन का क्या झोल न कर
तरुप का पत्ता नहीं हूं
चंद सांसे हैं बाकि मखौल न कर

जो कहा, सुना है
चांदनी के बीच एक तारा चुना है
कल जो भरी आंखों से दिखेगा जमीं से
अब यही सुनील किनारा चुना है

बुधवार, 31 अक्टूबर 2018

देश डीजिटल हो रहा है और जो जानते नहीं डीजिटलाइजेशन वो रो रहा है

देश डीजिटल हो रहा है और जो जानते नहीं डीजिटलाइजेशन वो रो रहा है. सत्य है इसके लिए आपको गांव जाने की जरुरत नहीं, शहर में ही हमारी तरह पढ़े-लिखे अनपढ़ मिल जाएंगे. क्योंकि जिसे आज के दौर में डीजिटलाजेशन का ज्ञान नहीं होगा उसे आप मोदी भक्त तो कहेंगे नहीं. अनपढ़ ही कहेंगे. वो इसलिए की वर्तमान में State Bank of India की हिमाचल प्रदेश की शाखा पर गया तो अटपटा सा लगा. लेकिन बाद में सोचा शायद कोई प्रोबल्म हो सकती है, मन में ख्याल बना लिया इग्नोर किया क्योंकि हाथ में चैक था. चलो चैक तो लग गया. अब बाहर एटीएम से पैसे निकलवाने आया तब ज्ञान पड़ा की भई ये सब मोदी माया है , जो अब तक समझ नहीं आया है.
जी #PM Narendra Modi जी अब यही हाल है हमारे डीजिटल इंडिया का जिसमें Arun Jaitley जी की उम्र का वर्ग बैंक में जाकर धक्के खाने को मजबूर है. State Bank of India की शाखा में अब #ATM से पैसे जमा किए जाते हैं. पहले एक फोर्म किसी से भी भरवा लो पैसे जमा हो जाते थे. लेकिन अब एटीएम से ही जमा होते हैं. मतलब साफ है कोई अधिकारी आपकी बात नहीं सुनेगा. न ही अपनी सीट छोडकर आपके अकाउंट में पैसे जमा करवाने एटीएम की तरफ जाएगा. पंजाब आकर फिर पैसे जमा करवाने की समस्या उनके साथ थी जिन्हें एटीएम पर उंगली टच करते हुए भी दिल में घबराहट होती है.
और किसी अंकल या आंटी जी को अपने बेटा-बेटी के अकांउट में पैसे भिजवाने है जो बाहर किसी शहर या राज्य में पढ़ते हैं तब उन्हें फिर से किसी के तरले करने पड़ेगे जनाब-- उनके अकाउंट से पैसे ट्रांसफर कर दो. दोनों ही स्थिति में पहले बैंक अधिकारियों से सूनो और फिर किसी नौजवान को पकड़कर उससे पैसे जमा करवाने के लिए दर्खास्त करे,,, ये है हमारा डीजिटल इंडिया... सच में देश बदल रहा है जहां जनता को पैसे जमा करवाने के लिए भी किसी न किसी मिन्नते करनी पड़ रही है. और रोज बैंक में आने वाले 90 फीसदी लोगों के साथ यही समस्या पेश आ रही है.
अभी कहां साहब - अभी तो बात शुरु हुई है. अब कब कहां किसी एटीएम से किसने कितना कैसे गुल किया सिर्फ खबरे ही आया करेंगी. और बैंक कर्मियों के सिर पर फिर असली समस्या नाचेगी जब एटीएम में ट्रांजेक्शन किसने कहां कब किस वक्त की थी. उसकी सीसीटीवी फूटेज निकाल -निकालकर जब देनी पड़ेगी. इसलिए सरकार फैंसला और नियम वही बनाइए जो सर्वहित में हो. जनता अभी डीजिटलाइजेशन में इतनी जागरुक नहीं है. क्यों उसकी मेहनत पर पानी फेर रहे हैं. दिहाड़ी लगाने वाले इंसान के पास आपकी इस तकनीकी को समझने का वक्त नहीं. और न ही उसके पास कोई ऐसा लोकर है की महीने की हजार रुपए की बजत को रख सके. देश में 10 रुपए जेब में हैं या नहीं बिना पूछे तो सिर कत्ल हो रहे हैं. अब ये मेहनतकश हाथ किस-किस की मिन्नतें करते फिरें जरा आप ही बता दीजिए. जो नियम आप और आपके अधिकारी बनाते हैं - कभी धरा पर नंगे पांव उन्होंने पोजिशन होने पर रखा नहीं होगें. अब उन्हें क्या पता आम जन कितने रुपए किलो वाला आटा और टमाटर खरीद रहे हैं,
साफ शब्दों में- हमारा देश शहर और गांव दोनों कैसे हैं कभी सफर कीजिए हकीकत से बाकिफ हो जाएंगे. क्योंकि किसी नेता का जब दौरा उस क्षेत्र में होगा तब सड़के भी साफ और व्यवस्था भी खास, जिस रास्ते से नेता गुजरता है. लेकिन हकीकत कुछ और होती है. कभी वक्त मिला तो देखिएगा की जो हम कह रहे हैं समझ तो हमारे कहने पर किसी को आता नहीं. जब तक अपने साथ ये समस्या पेश न आए.
देश बदल रहा है सच में
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RBI आजकल State Bank of India में पैसे जमा करवाने मुश्किल है.पहले किसी से भी फार्मभरके राशि जमा की जा सकती थी, अब दूसरे के अकाउंट में डालने है तब भी मना किया जाता है. #ATM से होंगे. जिन लोगों को #ATM चलाने नहीं आता उनका क्या होगा. नीति वो बनाए जो सर्वहित में हो. हकीकत क्या है देखिए - Arun Jaitley जी जनता अपना पैसा ही जमा करवाने के लिए हाथ जोड़ रही हैं.खास कर ग्रामीण इलाकों में उनको जिनके बच्चे बाहर पढ़ते हैं या किसी को पेमेंट करनी है.ऐसे में जब किसी को बोल के #ATM से पैसे ट्रांसफर करवाते हैं तब क्या मामले सामने आ सकते है जिसका State Bank of India अंदाजा नहीं शायद .

माशाल्लाह

कुछेक का अंदाज़ माशाल्लाह है
कुछेक की आवाज़ माशाल्लाह है
कइयों से मिला नहीं अरसे से
दिखे तस्वीर, तारीफ भी क्या करूं ?
वर्षों पहले का अंदाज़ माशाल्लाह है

आँखों से शराफत का शरवत
होंठों पर मुस्कान- ए- गुलिस्ताँ ही पर्वत
दवे हुए दिल में कई अरमा है जो देवदूत
कभी-कभी आती है आँखों मे हरकत

अब भी ज़िंदा है रूठों को मनाने का अंदाज़
अंजलि, पुष्प और जिवंत रूह सा अहसास
आँखों में तैरता है आज भी मजबूरियों का जहाज
मुर्दा होकर भी इंसानियत जिन्दा रखती है
ऐसी है उसकी काया, शांतमयी है जिसकी छाया
आज भी गूंजती है सालों पहले सुनी थी जो आवाज़

गुरुवार, 25 अक्टूबर 2018

आज फिर छत से तनहा दिखेगा चाँद


आज फिर छत से
तनहा दिखेगा चाँद
टीमटीमाती चांदनी
तनहा दिखेगा चाँद 


होगी दुआ उनकी काबुल
मांगेगी वो मांग का सिंदूर
करेंगी फ़रियाद उससे
जो सालों से तन्हा बेकसूर

जानता है वो तन्हाई का सितम
काली रात में दिखती परछाई सी किस्म
सोने सा पूर्णिमा को चमकता जिसका जिस्म
ए चाँद जरा जल्दी उगना भूखा-प्यासा है प्रीतम

तू बखूबी जनता है मेरे प्यार का आलम
एक सा नहीं रहता प्रीतम का बालम
कभी पूर्णिमा सा दूर से छलकता है प्यार
कभी करवाचौथ सा रहता है बेशब्र इंतज़ार

कभी बढ़ता -कभी कम होता है इज़हार
कभी रूत बदले रूठे जो मितवा
तब अकेला दिखता है तू
और खुद का खुदगर्ज़ सा संसार
लगता है अब अमावस ही छा गई
बहार आने का रहता है फिर इंतज़ार

हाँ सुनील फिर सोचता हूँ -
आज फिर छत से
तनहा दिखेगा चाँद
टीमटीमाती चांदनी
तनहा दिखेगा चाँद

#करवाचौथ_और_चाँद

कभी सुनी है तान

कभी सुनी है तान
जो कहती है नैनों की शान
कभी छीन लेते हैं आराम
कभी घायल होता है दिल
बिना तीर और कमान

कभी सुनी है तान
मंद सी मुस्कराहट की
दबे हुए लबों से
खिले हुए बालों की

कभी सुनी है तान
दबे पांव की आहट की
हवा में घोले संगीत मधुर
छनक उस पायल की

कभी सुनी है तान
बिना शब्द और साज
गूंजती है एक आवाज़
दूर होकर भी पास ही
नज़र आते हैं जनाब

कभी सुनी है तान
घूम हुए बैठे हैं इंसान
क्या सुनील ये कैसा पैगाम
नाराज़ है वो क्यों
न अब रूह ए राज का अंजाम

रविवार, 7 अक्टूबर 2018

ज़मीनी हक़ीक़त: दिवाली आई तो लक्ष्मी पूजा , लक्ष्मी के रूप में बेटी आई तो काम दूजा

  लगभग एक सदी के अंतराल से सुन रहा हूँ की ,भ्रूण हत्या करना पाप है -वर्तमान में अभियान भी चल रहा है बेटी बचाओ - बेटी पढ़ाओ लेकिन वास्तविकता से जो बिलकुल परे है। वो अभियान सिर्फ दीवारों पर लिखने और सरकार के पोस्टर के बिकने के लिए है। औरत को कत्ल करने के मामले ,नवजात बच्ची का शव कूड़े के ढेर में मिलना - आज भी दहेज़ के ही नवविवाहिता को मरना और वर्तमान में सबसे ज्यादा हवस के पुजारियों द्वारा औरतों को अपना शिकार बनाकर अपनी दरिंदगी की प्यास बुझाना। आजकल हालात कुछ ऐसे है ही समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी चैनलों में भी आपराधिक गतिविधियों की ख़बरें ज्यादा होती है।  कई बार तो दिल्ली जैसे कांड सामने आज भी आते है तो रूह कांप उठती है की देव-ऋषि-मुनियों की इस धरती पर कैसा ये कलयुगी मानस जन्म ले रहा है।

जब भी कोई त्यौहार या पर्व आता है आरती के गुणगान के बरावर औरत को स्थान दिया जाता है।  लेकिन सत्य रूप से औरत के साथ समाज में अन्याय होता है। पूर्ण रूप से इसके लिए पुरुष वर्ग ही दोषी नहीं है।  कई स्थानों  या बातों में औरत भी इस कथनी और करनी में बराबर की हिस्सेदार होती है।
अक्सर पढ़ा और सुना होगा -
गरीबी मर्दों के कपडे उतरवा देती है
और अमीरी औरतों  के ( इसका उदारहण अगर प्रत्यक्ष रूप से देखना होगा तो अपने नज़दीकी किसी भी मॉल या मार्किट में चले जाइये साफ़ दिखेगा )
लेकिन आज भी जहाँ महिलाओं साथ समाज में हो रहा है एक घर के भीतर हो रहा है सबसे अधिक ऐसे केसों में महिला ही महिला के अपमान, निरादर , यहाँ तक की मौत की भी ज़िम्मेदार होती है।
साधारण सी बात है - जब भी कूड़े के ढेर या किसी आवारा कुते के मुह से कोई बच्ची मिलती है तो उसे छोड़ने वाली माँ का दिल कैसा होगा। जब एक बाप  अपनी ही बेटी और एक भाई का अपनी ही बहन से दुष्कर्म का मामला सामने आता है तो उस भाई की मानसिकता कैसी होगी। समाज में जब किसी की बहु बेटी का मजाक उड़ाया जाता है - तो उस हंसी के पीछे अंदर ही अंदर जलकर भाप बनने वाले आंसुओं की तपस क्या होगी। इसको कोई समझ नहीं सकता और न ही जान सकता है। लेकिन समाज की मानसिकता तो कहीं न कहीं आईने पर लगे दागों की तरह साफ़ दिखाई देती है कि --   दिवाली आई तो लक्ष्मी पूजा , लक्ष्मी के रूप में बेटी आई तो काम दूजा। 

ज़मीनी हक़ीक़त ..... तो कभी नहीं बदलेगी देश की दिशा और दशा ?

  हर छोटा-बड़ा नेता और फिल्मो अभिनेता यही कहता कि हम देश की दिशा और दशा बदलेंगे। फ़िल्मी बातें तो काल्पनिक है लेकिन जो वास्तविक है वो समाज में सरेआम है। हर कोई भलीं भांति वाकिफ है की कौन क्या कर रहा है: लेकिन उस पर या तो हमारे ही होंठ बंद जाते है या  आंख और कान से हम अपँग हो जाते है. वर्तमान में भी कुछ है हर राजनितिक पार्टी देश को बदलने की बात कर  रही है। ये जूठ नहीं बदलाब हुआ है। इतना बदलाब हुआ है कोई  नेता कभी हाथ से मौका नहीं जाने देता विपक्ष को लपेटे में लेने से। लेकिन अब इन राजनितिक पार्टियों में एकता और अखण्डता की बात भी खत्म सी होने लगी है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश की बात करें या पंजाब की दोनों ही राज्यों में वर्ष 2017 में चुनाव होने वाले है। 

जिसको लेकर हर पार्टी जनता को लुभाने में जुटी हुई है। इसी बीच पार्टियों की अंदरूनी कलह बाहर खुलकर आने लगी है। चाहे वो सपा के मुलायम सिंह यादव का तंज़ हो या फिर आप के सुच्चा सिंह छोटेपुर की खुद की अढाई साल की कहानी। दोनों से साफ़ है जिस परिवार के भीतर ही क्लेश है वो बाहर किसी को क्या सही दिशा दिखाएगा - किसी की क्या दशा सुधरेगा। बचपन में पढ़ा था कि जिस परिवार में कहल हो बुद्धिमान और विद्वान उस स्थान को ही छोड़ देते है। लेकिन हम कुछेक राजनेताओं के द्वारा भ्रष्ट किए हुए देश को नहीं छोड़ सकते। पर नेताओं और इनकी बनाई हुई नीतियों से जरूर मुह मोड़ सकते है। प्राथमिक शिक्षा  लेकर माध्यमिक तक सबने पढ़ा है बुरा मत देखोबुरा मत सुनो, बुरा मत  बोलो और अब बुरा पढ़ो भी क्योंकि इन नेतओं के द्वारा कभी कभी ऐसे बयान दिए जाते है की न्यूज़ में सुनना तो दूर न्यूज़ पेपर में पढ़ना भी सही नहीं -- (किस्सा याद गयागॉव की बात है अपनी पड़ोस में आंटी से अखबार मांगने गया तो उहोने मुझे काफी धरातल से जुड़ा हुआ बयान देते हुए कहा -: हमने अखबार लेना बंद कर दिया इतना अनाफ सनाफ़ होता है ,हर चौथे पेज़ पर तो लड़की से हुए गलत काम (बलात्कार) की खबर होती है। बच्चों के सामने और घर में हर कोई कहीं ना कहीं अखबार लेकर बैठा रहता था तो ऐसे में कैसे अखबार पढ़े और आजकल तो लीडर भी कुछ भी बोल देते है ऊपर से अखबार वाले भी बड़े बड़े अक्षरों में लिखते है - दूर से ही नज़र हो जाती है ,खबर तो तेरे अंकल को बोल कर मैंने अखबार ही बंद करवा दी )  - ये बात भी सच है - नेताओं के ब्यानों और उनके विचारों की तो हम रीस ही नहीं कर सकते है। साफ़ बात ये है की हर नेता आपस में एक  चरित्र पर कालख उछालने पर लगे रहते है। खुदा कसम:_- चाहे कश्मीर का मुददा हो या शहीद का प्रतिक्रियाओं में ही जंग शुरू हो जाती है। और किस्सा ख़त्म होता है सदन का वक़्त बर्बाद करके। जिस देश में देश के कर्ताधर्ता और उसके  साथियों नहीं पता की देश किस दिशा में है और देश की दशा क्या वो देश तरकी कैसे करेगा। सत्ता और विपक्ष को तो बयानों पर प्रतिक्रिया देने से ही वक़्त नही तो काम कैसे करेंगे , कौन करेगा। आपत्ति जनक टिपण्णियों से देश की जनता का पेट भरेगा।