शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

रेप और राजनीति - इतनी फूहड़ता कहीं नहीं देखी

रेप और राजनीति - इतनी फूहड़ता कहीं नहीं देखी

बलात्कार क्या होता हैः गूगल पर सर्च करोगे, बड़ी आसानी से कई हिस्सों में बलात्कार के मतलब मिल जाएंगे, कई संधि विच्छेद भी. लेकिन दिमाग में पहले घंटी बही करेगा जो आज तक आपने सूना है. जैसी परिभाषा दिखाई गई है, 16 दिसम्बर भारतीय इतिहास का काला दिन, जब हमने भी जाना था कि बलात्कार क्या है, लेकिन शायद उससे पहले एक मां भी अपनी बेटी से सेक्स एजुकेशन को शेयर करने से डरती या शर्माती होगी. इसलिए बीते दिनों पीएमो से अपील की है कि सेक्स एजुकेशन स्कूल से ही पढ़ाई जानी चाहिए. लेकिन दिल्ली में हुए बलात्कार के बाद इसपर चर्चा आम होने लगी. उन दिनो जब दिल्ली में रुह को झकझोर देने वाला अपराध हुआ था. उस दौरान हर घर में इसी बात की चर्चा थी. हमाऱे घर में भी -लेकिन राजनीतिक महौल और जिस किस्म की बयानबाजी जारी थी,नानी ने उस बयानबाजी को सुनते हुए कहा था- इतनी फूहड़ता कहीं नहीं देखी.

आज बलात्कार रेवाड़ी में हुआ. किसी इज्जत फिर तार-तार हुई है. पर राजनीतिक तौर पर फूहड़ता का दौर जारी है. बलात्कार की घटना का कोई पहला वाक्य नहीं है, दो-चार दिन बाद कोई नया वाक्य सामने आ जाएगा. राजनीतिक फूहडता का काम जारी है.

 चिंता न कीजिए टीवी पर टीआरपी और सोशल मीडिया के साथ-साथ शब्दों के सिपाही - तलबार बाजी कर रहे हैं. ताकि आपका आकर्षण और भी गहरा हो सके. आपकी आंखे उन शब्दों पर ऐसे टीक जाएं जैसे कोई पीड़िता अपने जिस्म को पोस्टमार्टम के वक्त कड़ा कर लेती है. मोबाइल, टीवी रीमोट , और अखबार पर भी हमारी नजरें और ऊंगलियां ऐसे ही कड़े शब्दों को देखर रुक जाती हैं. क्लिक करके जानिए पूरी कहानी.. लला-भभा - अ ब स द जो भी इस्तेमाल में लाते हैं. (ऐसी शब्दावली का हम विरोध करते हैं ) साथ ही टू फिंगर टेस्ट  का भी ,

 कुछेक बच्चियां या लड़कियां होगीं जिन्हें शायद पता नहीं की टू फिंगर टेस्ट क्या है. हमें अभी ज्ञान नहीं की मेडिकल के दौरान पीड़िता का टेस्ट इस तरीके से किया जा है या नहीं, लेकिन ऐसी स्थिति में या इस टेस्ट के जरिए जिनता हम समझते हैं - एक बार फिर रुह को झकझोर दिया जाता है. और पीड़िता शायद अंदर ही अंदर उस दौरान भी घूट रही होती है. क्योंकि इस तरह से मेडिकल के दौरान  जो स्थिति होती है- अगर महसूस करते हो तो उस दर्द को भी कीजिए-

बलात्कार के बाद पीड़ित लड़की  सरकारी अस्पताल में सफेद रंग की चादर पर लेटी  हुई थी . नर्स ने आकर पहले उसकी सलवार खोली और फिर कमीज को नाभि से ऊपर खिसकाया. इसके बाद दो पुरुष डॉक्टर आए. उन्होंने लड़की की जांघों के पास हाथ लगाकर जांच शुरू की तो उसने एकदम से अपने शरीर को कड़ा कर लिया. एकाएक दस्ताने पहने हुए हाथों की दो उंगलियां उसके वजाइना (योनि) के अंदर पहुंच गईं. वह दर्द से कराह उठी. डॉक्टर कांच की स्लाइडों पर उंगलियां साफ करके उसे अकेला छोड़कर वहां से चलते बने.

अब जिसका हम विरोध करते हैं-  जांच से पहले न तो पीड़िता की अनुमति ली और न ही उसे बताया कि उन्होंने क्या और क्यों किया. टू फिंगर टेस्ट गैर कानूनी है और अवैज्ञानिक भी. लेकिन कुंठित डॉक्टर देशभर में इसे जारी रखे हुए हैं. यह टू फिंगर टेस्ट (टीएफटी) था. साहस से सफेद चादर  से वो लड़की उठती है  तो हमारा भी फर्ज बनता है कि उसके प्रति अपनी भावनाओं में बदलाव न लाएं. बल्कि सहानुभूति दिए बिना उसका साथ दें- न की दूरी बनाएं,

 हम जो भी कहें वो समझ तो नहीं आएगा, क्योंकि इन मामलों में आप हमसे कहीं ज्यादा समझदार हो,  हां ये भी है-  हमने उन आंखो को पास से गुजरते हुए देखा है,जो इस दर्द से गुजर चुकी रूह है. वैसे भी अब पग-पग पर बलात्कार होता है. विश्वासघात को भी हम बलात्कार की संज्ञा से कम नहीं रखते. प्यार करो - चार दिन बातें करो, दोस्ती रखो- मतलब निकालो, जिम्मेदार हालात भी नहीं, विश्वास तोड़ कर,घात लगाकर, बलात्कार कर दो वस !  इसलिए एक कविता में हमने पहले ही विश्वास तोड़ने वालों को भी बलात्कारी करार दिया है. मौका परस्तों से भी सावधान क्योंकि कुछेक राजनीतिक नुमाइंदो की तरह मौके पर ही दस्तक देकर चर्चा में आकर हम जैसों का बेवकूफ बनाते हैं. कितनी फूहड़ता हो गई है ना सच्ची....




गुरुवार, 13 सितंबर 2018

कांग्रेस पर 1984, अकालियों के सिर बेअदबी और भाजपा

कांग्रेस पर 1984, अकालियों के सिर बेअदबी और भाजपा

राजनितिक परिवेश भी अंडमान निकोबार की स्थिति जैसे है लेकिन अंदरूनी और बाहरी स्थिति चुनाव के दौरान समुद्र में बहते लावे की तरह हो जाती है।  जैसे -जैसे चुनाव नज़दीक आते है एक नया मुद्दा मिल जाता है, लेकिन न भी मिले तब भी कोई बात नहीं।  लावा जब समुद्र में बहेगा फिर भाप दिखना लाज़मी है।  अब 2019 के लोकसभा चुनावों को ही ले लीजिए।  पेट्रोल -डीजल अब इतने महंगे हो गए कि  शाम को जॉब से घर वापिस जाते वक्त, जब दोस्तों के साथ महखाने का जो भी रुख करते हैं- उनके दो पेग की कैपेसिटी शायद और बढ़ गई है।  क्यूंकि टेंशन हो गई है - क्यूंकि जेब में पैसे हैं नहीं और देश का पैसा लेकर कई भगोड़े हो गए हैं।  जिस कारन शराब कारोबारी विजय माल्या के चक्कर में वित्तमंत्री अरुण जेटली विपक्ष के लपेटे में हैं।  

लेकिन रुख अगर समुद्र में बहते हुए लार्वे की तरह पंजाब का करें तो यहाँ पानी के मसले पर अभी चर्चा नहीं लेकिन हरियाणा में इनेलो मसला गर्म किए हुए हैं. गौर हो की बेअदबी मामलों को लेकर एस आई टी बन गई है लेकिन नवजोत सिंह सिद्धू हों या आप कोई किसी से कम नहीं - सब बादलों के ऊपर खूब बरस रहे हैं। 
अब ये तो गलत है भई : बादलों के ऊपर कोई, कैसे बरस सकता है। 

वक्त का ये परिंदा रुका है कहाँ - बादल सत्ता में थे तब भी पंजाब में 1984 के मसले पर कांग्रेस को लपेटे में लेते रहते थे , अब नहीं हैं तब भी - क्या करें सरकार ये 1984 का मसला क़ानूनी तौर पर हल हो सकता हैं लेकिन राजनितिक रोटियां भी सेंकनी है और वो भी मक्की की।  हर बार चुनावी बिगुल जब भी बजता था. तब धार्मिक तौर पर मुद्दा गर्माता है। लेकिन अब क्या होगा जनाब - अब अकालियों को कांग्रेस से कौन बचाएगा- नवजोत सिंह सिद्धू - बादल साहब की बाप -दादाओं और पैदाइस तक पहुंच जाते हैं. लेकिन बादल साहब कम थोड़ी - उन्होंने सिद्धू को मैंटल बताया है.

अब जहांपना जो भी हो यह कहनें में कोई दोराय नहीं कि 'कांग्रेस के सिर 1984 और अकालियों के सिर बेअदबी' :-: खूब बनेगा अब राजनीतिक महौल :-: , एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला बरकरार है।  अब  2019 की चुनावी हलचल को देख एक कहानी याद आ रही है- दो बिल्लियों और एक बंदर की - क्योंकि कांग्रेस और अकाली एक दूसरे पर लांछण लगाने से कहीं भी किसी भी मंच से पीछे नहीं, उधर रुसे यार नू मना लै- वक्त औण ते कम आवेगा-- वाला सीन आम आदमी पार्टी के बीच चला हुआ है. भगवंत मान धड़ा दिल्ली हाईकमान के साथ मिलकर सुखपाल खैरा धड़े को मनाने की फिराक में है. वैसे काबिले जिक्र है कि आप अब राजनीति जान गई है - क्योंकि चुनाव प्रचार में भी जुटी हुई है और अकाली- कांग्रेस को भी आड़े हाथ लेने से नहीं छोड़ रही। अब कहानी में बाजी कौन मारता है,  य़े 2019 के नतीजे ही बताएंगे।  जिनके समीकरण हाल ही में पंजाब में होने वाले जिला परिषद के चुनाव तय कर देंगे।

अब आप कहोगे यार कि पंजाब में अकालियों का भाजपा के साथ गठबंधन है लेकिन जिक्र कहीं नहीं। एचुअलि  हो तो सिर्फ धर्म की राजनीति रही है - पर भाजपा ने जो आग अब पैट्रोल के दामों में लगाई है। उससे समीकरण कुछ अभी कहने में सक्षम नहीं की 2019 तक अयोध्या राम मंदिर निर्माण हो पाएगा या नहीं।  होगा- तब जग जाहिर हो ही जाएगा। पर साहब धर्म के आधार पर राजनीति और कोर्ट में मामला दोनों चल रहे हैं.

चाहे वो 1984 हो या अयोध्या राम मंदिर निर्माण या अब का ताजा मसला ले लो गुरु ग्रंथ साहिब जी के अंगो की बेअदबी  \ अब यह तय है 2019 तक न ही ये मसले हल होंगे और न ही ब्यानबाजी रुकेगी। फिर सरकार जो भी सत्ता में आएगी मक्की की नहीं मिसी रोटी खाएगी विद वट्टर -

बुधवार, 12 सितंबर 2018

पता नहीं, क्या है शान - नहीं है ज्ञान

पता नहीं, क्या है शान - नहीं है ज्ञान

15 अगस्त बीत गया- अब 26 जनवरी आएगा. जिस भाव में लिखा है शायद समझ जाओ, क्योंकि गणतंत्र और स्वतंत्र दिवस के बाद किस को कोई फर्क नहीं पड़ता की तिरंगा क्या है और झंडा क्या है. सबके लिए आम सी बात हो जाती है . क्योंकि मंत्रियों की गाड़ियों पर लगा झंडा भी कई दफा शाम बीत जाने के बाद भी अगर नजर और ख्याल में रहा तब उतार लिया जाता है वर्ना कौन उसका राखा है. शायद कोई नहीं क्योंकि आंखों के सामने पड़ी हुई चीज भी हमें कई दफा दिखाई नहीं देते. किसी व्यक्ति विशेष की बात नहीं आम सी बात है गौर कीजिए-

हाल में ही भाजपा अध्यक्ष किन्हीं कारणो से 15 अगस्त को खूब चर्चा में रहे सोशल मीडिया पर भी महाशय की खूब खिल्ली उड़ाई गई. लेकिन जनाब कुछेक आज भी अगर सुबह से शाम तक काम करने वाले मजदूर को अगर बोलोगे की भई झंडा फहराना है शायद वो न फहरा पाए. चाहे वो अपने बेटे के टॉप के हाई प्रोफाइल स्कूल में पढ़ा रहा हो. वो भी नहीं फहरापाएगा. इसमें हमारी को दोराय नहीं और न ही आपकी भी होगी क्योंकि शायद आपको भी पता नहीं की कैसे झंडा फहराया जाता है. यहां भाजपा अध्यक्ष के पक्ष में भी नहीं कल को कहो की भई उनके हित में लिखा था. राजनीति पसंद  नहीं

अब मूद्दे की बात - झंडा किसी भी देश का हो हमारी जितनी समझ है , उस देश की शान है. वो बात अलग है की लोग इंग्लैंड देश के झंडे के कच्छे ( ) भी बनाकर पहनते है. गुजारिश ही कर सकता हूं कानून नहीं बना सकता. प्रोटेस्ट कीजिए लेकिन कभी किसी देश के झंडे को आग न लगाइए क्योंकि आपके  इस कदम से उस इंसान की भी भावनाएं आहत होंगी . जिसके न तो आपके प्रोटेस्ट से लेना देना है और न ही किसी मुद्दे से

अब खास तौर पर दिमाग तब खराब हुआ जब हमें खुद भी एक वक्त झंडा फहराना नहीं आता था. लेकिन बाकी कैसे सिखेंगे - कौन सिखाएगा , हमने भी खुद ही सिखा- न न हमें भी गुजारिश करने पर सिखाया गया. लेकिन आज के बच्चे जो हमारे देश का भविष्य हैं कल को पता नहीं कौन सा नेता बन जाए . पर उन्हें अगर पता ही नहीं होगा की कैसे झंडा फहराया जाता है, फिर वो कैसे फहराएंगे.

इसलिए अब सरकार इसमें कुछ कर सकती है, हम और आप सिर्फ गुजारिश कर सकते हैं, एक फरियाद जो फरमान हो आम. क्योंकि अगर स्कूल से ही इस बात की और ध्यान दिया जाए तो शायद भविष्य में अमित शाह जैसा कोई औऱ ट्रोल नहीं होगा, और न ही फिर से मीडिया की सुर्खियां बनेगी कि किसी के पैरों के नीचे देश की शान, ये वो --- हमारा देश महान ---

इसलिए भारत में जैसे हर सिनेमा घर में राष्ट्रगान गाया जाता है, वैसे ही हर स्कूल में प्रर्थना के वक्त झंडा कैसे फहराया जाता है स्कूली छात्राें को भी बताया और सिखाया जाए . ताकि वो समझ सके की भारत की महानता क्या है. नहीं तो कल को वो भी गुगल कर ही लेंगे. जैसे आज हम जैसे कुछेक करते हैं- जिन्हें पता नहीं हमारे देश का राष्ट्र चिन्ह क्या है, यूं बेशक शेर बने घूमते हों.

Write to PMO India
Write to PMO India

मंगलवार, 11 सितंबर 2018

खूबसूरती आपकी शैल्फी में नहीं दिमाग में चाहिए जनाब, फिर लगेगी आग



खूबसूरती आपकी शैल्फी में नहीं दिमाग में चाहिए जनाब, फिर लगेगी आग

एक बात गौर की कभी- दो-चार दिन बाद लड़कों के फोन सिर्फ खराब होते हैं. लेकिन लड़कियों का फोन सीधा ब्लास्ट ही होता है. क्योंकि लड़की की डीपी और पिक्स लड़के छुप-छुप कर देखते हैं. फिर जो खूबसूती लड़की की होती है उसे मोबाइल फोन सहन नहीं कर पाता और ब्लास्ट हो जाता है. ब्लास्ट की स्थिति से पहले कभी किसी लड़की से पूछिएगा कि यार रिप्लाई क्यों नहीं कर रही हो. वो यही बोलेगी -फोन हैंग हो गया था.
भई अब हैंग होना लाजमी है- क्योंकि इतने फीचर आईफोन भी स्पोट नहीं करता फिर एंडरोइड कैसे कर लेगा. लेकिन इस खूबसूरती को कैद करने के चक्कर में मर्द जात की पतलून अब सैट दिखने लगी है. आपने एक-दो साल पहले देखा होगा कि लड़के इस तरह से पैंट बांधा करते थे जैसे पतलून नीचे ही गिरने वाला हो, वो इसलिए की उस वक्त जेब में पैसा हुआ करता था. लेकिन नोट बंदी के बाद भई बंदी (गर्लफ्रैंड) के  चक्कर में कई लोग ड्रैसअप सीख गए. अब पैंट सैट है लेकिन आए दिन फोन खराब हो रहा. यही कारण है कि प्रकृति की सुंदरता जैसे कश्मीर को जन्नत कहा जाता है. धौलाधार की पहाडिया, कई ऐसे स्थल - शायद धरती की खूबसूरती को देख आस- पास के ग्रह ही नहीं. धरती के भीतर भी जलन हो रही है क्योंकि उन्होंने शायद खूबसूती को महसूस किया है, धरती के बाहर से-  अंदर जो जीव जाते हैं वो बताते होंगे - तभी धरती के अंदर आग लगी हुई है-- हां - समझ आया ग्लोबल बार्मिंग क्यों हो रही है. क्योंकि 'धरती पर कुछेक चीजें हैं ही इतनी खूबसूरत;'

अब इस खूबसूरती को देख कर आप क्या सोचते हो - आप पर डिपेंड है, अगर धरती की खूबसूरती को बचाए रखना है, तब हमें पौधे लगाने होंगे. पर्यारवरण के बारे में आप हमसे ज्ञानी हो. और खूबसूरती की गालिब बात ही क्या करें- लड़कों में ही नहीं लड़कियों में भी डैसिंग लूक की चर्चा होती है. इसमें कोई दौराय नहीं.   अब ग्लोबल वार्मिंग से भी खतरनाक वाली स्थिति लड़के और लड़कियों में पैदा हो जाती है जब वो शैल्फी लेते हैं. माईलोर्ड- नोट दैट प्वाइंट - शैल्फी -

और शैल्फी भी ऐसी कीः आपने तरह - तरह के शायद हमसे बेहतर एंगल देखे होंगे या आपने भी बनाए होंगे- जिन्हें देख खूबसूरती की मिशाल भी नहीं दी जा सकती उसे भी आग लग जाए. शैल्फी का जिक्र करते अब लिखते-लिखते पुरानी याद और अल्फाज ताजा हो गए- दो साल पहले (2016) चंडीगढ़ स्थित रोज गार्डन में रोज़ फैस्टिवल देखने का मौका मिला दो अजीज दोस्तों के साथ (ज्योति अर्पिता) उस दौरान की खींची गई शैल्फी को पोस्ट करते वक्त लिखा था. - शैल्फी लेना सिर्फ एक सैकेंड का काम है, वक्त इमेज बनाने में लग जाता है.- पंक्ति काफी अच्छी है, अमल भी कीजिएगा.

ठीक शैल्फी का जिक्र आज के पोस्ट में भी है. क्योंकि न जाने कितने ही लड़के और लड़कियां एक-दूसरे की सैल्फी के मुरीद है. लेकिन मुरीद कुछ पल बाद मुर्दा हो जाती है क्योंकि उतनी देर में अगली पोस्ट का पोस्टमार्टम हमारी उंगलियां फोन या टैब पर कर रही होती है.  नैचुरल है भई - जरा न सोचिए
अब जो पोस्टमार्टम करते हैं गालिब उसकी मेडिकल रिपोर्ट के बारे में कभी जिक्र किया जाए, बैठे-बिठाए बंदे का हार्ट फेल हो जाए. इसलिए कभी किसी की खूबसूरती, आवाज पर कॉमेंट जरा सोच समझ कर कीजिएगा. तब बेहतर है कई दफा किसी करीबी को वह टिप्पणी आहत कर जाती है. अनेकों पोस्ट आपने भी देखीं होंगी जिनको देख आपका भी जहन कहता होगा यार गलत लिखा है, नहीं लिखना चाहिए था ऐसा... वैसे हम कभी किसी व्यक्ति -विशेष पर टिप्पणी करते नहीं. उम्मीद आपसे भी यही रखेंगे. अब मोदी सरकार के चाहे आप लेपेटे में लीजिएगा या मंगलसूत्र फिर पहनाइएगा आप पर डिपेंड है. लेकिन सार्वजनिक तौर पर ब्यानबाजी आजकल सोशल मीडिया ही नहीं हमारे अंदर भी क्रांति ला सकती है. सब डिपेंड करता है आप पर पॉजिटिव या नेगटिव वे में- ब्यानबाजी
चलिए अब फोन उठाइए और खूबसूरती का आनंद लीजिए - जिंदगी एक बार मिली है एंजॉय कीजिए , कुछ ऐसा कीजिए की वक्त भी आपका मुरीद होकर इतिहास के पन्नों को खूबसूरती से अंकित करे. न की चार कंधों के ऊपर सवार होकर ये जिस्म स्वाह हो जाए. मतलब फोन बार-बार ठीक हो सकता है, लेकिन ब्लास्ट हुआ फिर महंगा पड़ सकता है.
रिस्पेक्ट गर्लः  खास उनके लिए जो पीठ पीछे लड़कियों की तारीफ में कसीदे पढ़ते हैं- वो मर्द बनो जिसे औरत चाहे, वो मर्द नहीं जिसे औरत चाहिए.

सोमवार, 10 सितंबर 2018

शादी- उम्मीद जो जरुरी है, क्योंकि National Intrest है भई

 ध्यान से पढ़ना-
हर मां-बाप की बच्चों के बचपन से एक फिक्र और बात -बात पर जिक्र शुरु  हो जाता है. लेकिन 23- 27 साल के ऐज ग्रुप की बात करें तो एक बात हर जुबान पर होती है कि शादी नहीं करनी भई. आपके दोस्त या आप भी कभी -कभी यही बोला करते हो या बोलते थे या बोलोगे. क्योंकि वी आर सो बिजी इन लाइफ, फॉर मेक मनी, एंड ऑल

लेकिन शादी से इतना परहेज क्यों भई, ये तो हमारा नेशनल Intrest है. क्योंकि प्लानिंग  हमारे बचपन से ही शुरु हो जाती है. और रिश्तेदार भी हमसे पूछते हैं - आपको भी याद ही होगा. लेकिन यार इस शादी के लिए इतनी चर्चा बचपन से जब तक हो नहीं जाती . तब तक जारी रहती है.

लेकिन गौर करें हजूर - जहां करने की इच्छा होती है वहां होती नहीं. लेकिन नहीं होती ये भी अच्छा ही है. इसका कारण भी एक बड़ा इंटकस्टींग है. लव , सब अगला पिछला - सब पता होता है गर्लफ्रैंड और बॉयफ्रैंड दोनों को ही. लेकिन हर बार ऐसा ही नहीं होता. चलिए इस  बात को साइड में रहने देते हैं. आज नेशनल कल्चर के बारे में ही बात करते हैं. रिवाज के हिसाब से सब ओके रिपोर्ट है. कोई कहीं कमी नहीं. लेकिन बात यहां खूब जमीं है भई-

जब भी लड़का -लड़की को रिश्तेदार मिलवाते हैं. वी आर कॉल- लडकी को देखने गए हैं, या लड़की को देखने आए हैं, अगर बात ओके रिपोर्ट वाली हुई तो इंडियन रीत के हिसाब से काम चलता है. लेकिन एक बात यहां सब मस्त है कि हमें अपनो के लाड प्यार और एक भरोसे का एहसास पता चलता है कौन हमारी कितनी केयर करता है.

अब जब शादी की डेट फिक्स होती है तो न लड़के को पता होता है कि घर पर क्या चल रहा है , शादी की प्लानिंग को लेकर न ही लड़की को.. मोस्ट ऑफ द टाईम जोकि हमारा नेशनल कल्चर है,.

अब वो बात चो सच है या नहीं- जिसका सिर्फ जिक्र होता है बलि का बकरा तो लड़का होता है लेकिन लड़की की बलि अकसर ले ही ली जाती है. जो आज तक खबरों में पड़ा है. जो अकसर होते देखा भी है. हमारे समाज का नेशनल कलचर---- हम या आप उसे दहेज कहते हैं. वो दानव जो न जाने आज जितना डाटा पढ़ा तो ज्यादा हरियाणा. यूपी दिल्ली में निकल कर आया.. लेकिन आजकल दहेज लेने का तरीका बदल सा गया है. अब कैश में दहेज लिया जाता है.. वाह क्या आइडिया है.

लेकिन अब दहेज का नया रुप भी सामने आने ही वाला है. इसलिए बहु फिर हाजिर हो----
क्यों वो भी बता दिये देते हैं- अब लड़को की हिम्मत तो है नहीं की अच्छी या सरकारी नौकरी पा सकें, बात सरकारी की भी नहीं. लेकिन जिक्र कुछेक लड़को का ही- वो भी उनका जो सारा दिन घर पर रहते हैं या रहेंगे. और बीबी सुबह नाश्ता बनाएगी - जॉब पर जाएगी और शाम को आकर दो बातें रिश्तेदारों की भी सुनेगी,. हां इसके साथ एक और भी किस्सा है- दोनों जॉब पर जाते हैं - खूब कमाते हैं लेकिन एक दूसरे को संयम से वक्त नहीं दे पाते हैं. नतीजन रिश्तों में फिर भी कड़वाहट
दैस्ट अवर नेशनल कल्चर - शादी  से पहले भी, शादी के बाद भी  ये हुई असली एलआईसी
अब इस योजना का आपको मजा कैसे लेने है आप पर डिपेंड करता है. ज्यादा चिंता की बात नहीं, भावनाओं को समझो- प्यार से पत्थर भी पिघल जाता है. बस आध्यात्मिक शक्ति और आपसी प्रेम की भक्ति चाहिए. ताकि हमारा ये नेशनल Intrest चलता रहे.

 नहीं तो शादी न करने की बात भी सही है. पर बात न कीजिएगा, अड़े भी रहिएगा. फिर नतीजन जनसंख्या पर कंट्रोल तो लगेगा ही. हाहाहाहहाहा






शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

चाय में ढूबे बिस्कुट की तरह टूट जाता है इंसान

प्यार किया है कभी?  लेकिन जब  किया होगा, पहली दफा इजहार-ए-महोब्बत कम ही लोगों से हो पाता है. चलिए जिन्होंने किया है उनको आज एक बात बताते हैं. जो उनके साथ भी कई दफा घटित हुई है लेकिन हजूर करें तो क्या करें. आदत सी है दिवारों से सिर मारने की, लेकिन सिर पत्थर का हो जाता है पर कभी दिल पत्थर नहीं होता. वो तो पागल है
गाना सुना है ना- दिल तां पागल है, दो घड़ियां रोके चुप कर जू
पर दिलचस्प बात एक होर भी है. जिसे  हम नजर अंदाज करते ही नहीं, गुस्सा आकर भी पल भर में भूल जाने का गालिब सलिका हमें खूब आता है. क्योंकि जब हमें किसी से प्यार हो जाता है फिर तो मालिक इस दौर का खुदा ही है. हां- अगर एक तरफा हुआ फिर इंसान गधों से कम नहीं. जिसपर जितना वजन डाले जाओ घोड़े की तरह वो हरकत नहीं करेगा. बस अंदर ही अंदर भार को सहन करता जाएगा चाहे आंखो से आंसू क्यों न टपक पड़े.
 चलिए अब प्यार करने वालों की फितरत कुछ यूं होती है, जिसमें जो जितना ढूबता है , तैराकी मार कर बाहर आ तो जाता है लेकिन टूट जाता है. विश्वास नहीं होता !
अपना ही वो दौर याद कर  लो जब भरी सभा में भी उसी इंसान के बारे में सोचे कर बैठे रहना. जो आज फेसबुक या इंस्टाग्राम पर नजर पड़ता है. लेकिन छुपके से जब उसका सर्च प्रोफाइल करते हैं, फिर  क्या पल भर का सकूं पाकर रुह को शांति मिल जाती है.
 लेकिन  आज भी वही प्यार करने वाला इंसान वैसा है जैसे चाय में बिस्कुट ढूबो तो देतें है लेकिन अगर वक्त पर न निकाला वो ढूब जाता है. फिर वो चाय का स्वाद भी खराब कर देता है.  इसलिए किसी चीज मेें इतना न ढूबो की टूट जाओ. क्योंकि टूटे हुए इंसान को जुड़ने में अरसा लग जाता है . और फिर जिंदगी जीने का मजा भी किरकिरा हो जाता है.

चलो अब चैन से सोयें
फिर ख्बाव लें उसका
जिसको देखा नहीं है
शायद-
अरसे से दिख जाए वही चेहरा
 

शनिवार, 1 सितंबर 2018

अज्ञानी से क्यूं पूछते हो, यहां सब ज्ञानी हैं

यहां सब ज्ञानी हैं
किसी की दादी या नानी नहीं
सब गुगल की कारसतानी है
यहां सब ज्ञानी हैं

अज्ञानी से क्यूं पूछते हो
ज्ञान की बातें
कैसे जलता है दिया मजार का
क्या हाल है दिल-ए-एतबार का

कई आए- बैठे और चले गए
हाल जाना जेब के भार का
चंद सिक्कों के खातिर
खूबसूरती से बिकता है सब

फिर आंखों ने जो तरासा
वो हीरा है या शीशा
जो चमके बिखेरे हुए है
पूर्णिमा के चांद सा

कई मझे हुए खिलाडी मिले जिंदगी में
अनुभव को भी मात दे जाने वाले जाम सा
लड़खड़ाते दिखे कदम भी उनके
जो थामे बैठे थे मयखाने में रंग गुलाब का

अब हमसे न पूछो ज्ञान की बातें
अनुभव नहीं हमें रावण और बाण सा
अगर हो गई हमसे कोई गुस्ताखी
मिलेगा नहीं फिर रुह को आराम सा

यहां सब ज्ञानी हैं
किसी की दादी या नानी नहीं
सब गुगल की कारसतानी है
यहां सब ज्ञानी हैं

मंगलवार, 21 अगस्त 2018

देश की राजनीति भी क्या रंग लाई है


देश की राजनीति भी क्या रंग लाई है
सोच का श्रृंगार होकर एक मुद्दा लाई है
मत के लिए मति नहीं मारी गई है इनकी
विवाद की आग सदन तक पहुंचाई है

देश की राजनीति भी क्या रंग लाई है
सेकेंगे अभी और भी रोटियां
मोदी देखे हैं 2019 का ख्वाब
2022 में राहुल पहनाएंगे धोतियां

कश्मीर से कन्याकुमारी तक
जाया मत जाने दो शहीदों की शहादत को
अमर जवान की ज्योति देती दुहाई है
और पूछती है वो मां
राजनीति की आड़ में अपना नाम चमकाने वालों
कौन-सी चक्की की रोटी आज खाई है

देश की राजनीति भी क्या रंग लाई है
गला भी सूखता नहीं, थकान भी होती नहीं
राजनीतिक दल ने ही दलदल बना दिया है देश को
क्यों एकमत होकर हल निकलता नहीं

देश की राजनीति भी क्या रंग लाई है
शर्म अब आती नहीं होगी, शराफत जो बेच दी है
हैं जो चंद देश के खातिर जीने वाले राजनीति में
उन्हें भी 99 पर मात सियासत ने दे दी है

देश की राजनीति भी क्या रंग लाई है
देश की राजनीति भी क्या रंग लाई है
सोच का श्रृंगार होकर एक मुद्दा लाई है

सोमवार, 20 अगस्त 2018

लिखत का पता महखाने में जाना, इज्जत का पता पजामे से जाना

लिखत का पता महखाने में जाना
इज्जत का पता पजामे से जाना
क्यों दोष देना किसी की सोच को
खुद को भी हमने अनजाने में जाना

बढ़ा ही उल्टा है कलेश जाम का
पतलून जो पहनी उसकी शान का
फिर बदनाम होंगे तब क्या हुआ
अकेली रहती है खुदगर्जी
जैसे नाता बूंद और रेगिस्तान का

अब नशा ही जिंदगी का कर लिया
लास्टिक का पजामा भी परे कर दिया
चंद अल्फाज मिल जाते हैं आसमान में
तभी चांद ने चांदनी के लिए जहान कर दिया

उतर जाती है बड़े-बड़ों की
अगर नाडा अधर में अटक गया
फिर जो मर्जी तरकीब लगाओ
मैदान सूखा कमबख्त जिस्म भीग जाएगा

अब अलफाज उल्टा कहा नहीं जनाब
उल्टा जरुर सही सुनील जो है एक ख्वाब
तरकीब निकालने की जुर्रत न करें
समुद्र से मत पुछना लहरों का हिसाब

रविवार, 19 अगस्त 2018

कभी मशरुफियत से बैठेंगे, मशरुफ होके गलबात करेंगे

कभी मशरुफियत से बैठेंगे
मशरुफ होके गलबात करेंगे
आप अपनी कहें
हमारे जज्बात फिर गले तक रहेंगे
कभी मशरुफियत से बैठेंगे
मशरुफ होके गलबात करेंगे

यूं होती है बेशक बहुत बातें
कुछ अजीब सी पंक्तियां
दिल में कुछ, दिमाग में कुछ
और सुनाओ...
वाली चेटिंग पर बातें
जी भर कर बात करने का मन
बेमन भी बात करने वाला तन
वक्त निकाल के मिलेंगे सही
कभी मशरुफियत से बैठेंगे
मशरुफ होके गलबात करेंगे
मशरुफ है हरकोई जिंदगी में
फिर भी अकेलेपन की बात कहेंगे
किसे कहें अपना - चलो कह दिया
अरसे बाद दोगलेपन वाला साथ कहेंगे
आइने के सामने खड़े होकर देखा अपनापन
पटल पर दिखा अपना ही अक्ष, दूर एक तन
रुह के रथ पर सवार एक मनमौजी सा मन
कहता दिखा फिर सुनील खुदही से
कभी मशरुफियत से बैठेंगे
मशरुफ होके गलबात करेंगे

शनिवार, 18 अगस्त 2018

हम नहीं सुधरेंगे- नेता विरोधी हैं विरोध में गुणगान करते रहेंगे

हम नहीं सुधरेंगे- नेता विरोधी हैं विरोध में गुणगान करते रहेंगे

ਨੇਤਾ ਵਿਰੋਧੀ ਹੋ ਤਾਂ ਕਿ ਵਿਰੋਧ ਚ ਹੀ ਬੋਲੋਗੇ - पंजाबी में इसलिए लिखा ताकि पंजाब के उन नेताओं को समझ में आए आज सिद्धू के हक में नहीं विरोध में स्वर उंचे किए हुए है. वो भी इसलिए की वो पाकिस्तान गए इमरान खां के प्रधानमंत्री पद की शपथ के समागम में शरीक होने. इसी बीच दौरे के शुरु होने से दौरे के खत्म होने तक कुछेक नेता सिद्धू के खिलाफ नजर आए यहां तक की गोदी मीडिया भी इसमें कोई मसाला लगाने से पीछे नहीं रही. सबने सिद्धू की एक-एक तस्वीर को ऐसे दिखाया हो जैसे दोबारा जनाब इन्हें हाथ आने का मौका नहीं देंगे,
लेकिन गुरु तो दौरा शुरु होने से पहले ही कह चूके थे कि कहने वाले तो कहते रहेंगे और  वो पाकिस्तान दोस्ती के नाते जा रहे हैं. हालांकि पाकिस्तानी मीडिया को भी संबोधित करते हुए उन्होंने यही कहा कि यहां वो राजनीतिक संबंधों के चलते नहीं आए हैं. चलिए सिद्धू साहब का दौरा तो हो गया और उनके कलेजे भी ठंड पड़ गई जिन्होेने दौरा का विरोध किया प्रदर्शन किया यहां तक की शिवसेना ने नवजोत सिंह सिद्ध का पुतला भी जलाया.
अब लेख में कहेंगे कि सिद्ध होता है कि के पक्ष में लिख रहे हैं, अरे जनाब सदन में कभी हमारे और से चुने हुए नुमाइंदे एक नहीं. बाहर हम लोग एक नहीं. किताबों में खूब लिखा जाता है एकता में बल , अब कोई हल निकाल रहा है एकता और प्यार का तो उसके भी उंगली किए जाओ. अगर उंगली करने पर भी कम रह जाए तो मसला गर्म और तीखी मिर्ची लगा कर पेश करते हैं. अब कर लो व्यापार और पड़ोसी से प्यार , पड़ोसी के प्रति अपनी नियत और नीति कितनी साफ है ये तो कर नहीं पाते फिर कहोगे पड़ोसी ने सिर पर पत्थर मार दिया.

वैसे अब सब प्रत्यक्ष है -
खड़ा कर दो चाहे सर्वोच्च न्यायालय के कटघरे में
उंगुलियों की पंखुड़ियो पर रहता है हुक्मरानो के बयानों का हिसाब



#ImranKhan
.



गुरुवार, 16 अगस्त 2018

वरिष्ठ पत्रकार प्रसून बाजपेयी ढूंढ रहे है नौकरी या दिला रहे हैं नौकरी !

वरिष्ठ पत्रकार प्रसून बाजपेयी ढूंढ रहे है नौकरी या दिला रहे हैं नौकरी !

 होकर स्वतंत्र मैने कब चाहा है कर लूँ सब को गुलाम ?
मैंने तो सदा सिखाया है करना अपने मन को ग़ुलाम ।
 गोपाल-राम के नामों पर कब मैंने अत्याचार किया?
कब दुनिया को हिन्दु करने घर घर में नरसंहार किया?
-अटल बिहारी वाजपेयी ( हिन्दु तन-मन )

कविता के साथ ये पंक्तियाँ किसने कहाँ लिखीं ज्यादातर पत्रकार बंधु जानते ही होंगे। या शायद अब नज़र पढ़ जाए। वैसे बुधवार रात से वीरवार शाम तक हमे लगा की हर राज्य में सबका प्राइम टाइम अब या डिवेट शो अटल जी की जीवनी पर ही होंगे लेकिन सोच को मात मिल ही गई. लेकिन मुद्दा मिल गया और फिर क्या चर्चा शुरू - अटल की टककर का नेता क्या भाजपा के पास है। जमकर इसपर भी सियासत के तीर-कमान चलाए गए. टीवी शो में बेशक नहीं लेकिन उसके बाहर जरूर, अब सियासत हुई तब नज़र पुण्या प्रसून बाजपेयी जी की पोस्ट फिर लगा की अब प्रसून जी नौकरी ढूंढ रहे है या रोजगार समाचार ज्वाइन कर लिया है। लगा कुछ ऐसा है क्यूंकि उनके द्वारा जो हाल ही में पोस्ट ज्वाइन की गई हैं। उनको देखकर यही लगता है। केंद्र सरकार की पोल ढोल की थाप के बिना खोलने वाले पुण्य प्रसून वाजपेयी कहाँ है , अभी कुछ खबर नहीं। स्क्रीन पर हर किसी को इंतज़ार रहता है. ग्रामीण स्तर पर अब अगर रविश कुमार भी किसी दिन टीवी पर न दिखे तो सुबह को गांव की बस स्टैंड पर बनी दुकान में यही चर्चा होती है. भाई साहब रात रविश कुमार नहीं दिखे, जाहिर है की अब गांव के उम्र दराज़ लोगों को भी अब यही चिंता रहती है की कहीं रविश कुमार का पता न कट हो जाए। लेकिन हाँ अब प्रसून साहब की पोस्ट से यही ब्यान होता है कि या तो वो नौकरी ढूंढ रहे हैं या फिर रोजगार समाचार ज्वाइन किए हुए है. -
 बाजपेयी जी के ट्वीट
सारा ख़र्च राजनीतिक सत्ता पर.. ख़ाली पदों तक पर भर्ती नहीं..? सिस्टम लचर होगा ही

सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी - 1219 पद रिक्त आईआईटी - 2669 पद रिक्त एनआईटी - 1507 पद रिक्त आईपीएस/आईएएस- 2434 पद रिक्त जारी...पुलिस -4,43,524 रिक्त पद सेना/अर्धसैनिक बल - 65,699 रिक्त पद सरकारी शिक्षक—10,27,413 रिक्त पद ग्रामिण भारत में डॉ./नर्स-72,150पद रिक्त पोस्ट आफिस - 49,349 पद रिक्त बैक - 16,560 पद रिक्त जारी....

 सही मायने में प्रसून जी के ये ट्वीट उन पर कोई टिप्पणी नहीं है , लेकिन जो गोदी मिडिया हो रही है उससे लग रहा है कि आने वाले वक्त में इस तरह मिडिया कर्मी भी राजनीती की भेंट चढ़ेंगे। और इस तरह की टिप्पणियां की जाया करेंगे। वैसे भी हमे नहीं लगता की वर्तमान में प्रसून जी जैसे स्वतंत्र पत्रकार जो बोल सकें गिने चुने ही होंगे। लेकिन देश के कुछ युवाओं को उनके ट्वीट का फल मिलेगा और कुछेक यहाँ भी सिफारश पहुंचेंगे। जो आए होंगे अपने किसी पूजनीय के क़दमों पर चंद कागज के वो टुकड़े रखकर जिनके बल के आगे प्रसून जी कमजोर हुए और आज भी नौकरी ढूंढ रहे हैं , युवाओं के लिए की सरकार ने जो रोजगार देने का वादा किया वो निभाए तो सही। धन्यवाद प्रसून सर युवा पत्रकार सुनील के हिमाचली

21वीं सदी की आजाद देश में गुलाम जवान गजल ?

बधाई हो देश 72 स्वतंत्रता दिवस मना चूका है. क्रम यूं ही बढ़ता जाएगा. खुशी जीतनी हमें है उतनी शायद आने वाली पीढ़ी को नहीं होगी. इसमें कोई दोराय नहीं . वैसे भी 21वीं सदी अब जवां हो गई है. 2018 चला हुआ है. ठीक वैसे ही जैसे लड़की की उम्र 18 साल की हो जाए . तब चिंता होती है कि इसे देखकर कहीं पड़ोसी की नियत खराब न हो जाए. वैसे भी हमारे पडोसी की नियत कब खराब हो जाए और कब सीजफायर का उल्लंघन कर दे कुछ कहा नहीं जा सकता है.

अब 21वीं सदी जवां है और कानून के मुताबिक 18 साल की भी हो चूकी है. अब शादी की बातें  करना जरुरी है. वैसे भी स्वतंत्र देश के वासी है लेकिन 18 साल बाद भी हक नहीं कि बेटी कोई फैसला ले सके. चलिए जाने दीजिए हमें क्या- हरकोई लिखता है, बोलता है लेकिन समाज सुधरेगा थोड़ी, चलो एेसे तैसे लड़की ने फैसले को लेकर परिवार को मना लिया . लेकिन रिश्तेदार वो तो ऐसे एंट्री मारते हैं जैसे - क्रिकेट मैच चल रहा हो और टीवी की आवाज सुनते ही पड़ोसी घर में एंट्री मार गया हो. अब भई फिर आपको पता है जब इंटरस्ट की बात हो तो सबको मजा आता है. और किसी के पंखो को कतरना हो तो इससे भला बेहतर वर्तमान मेें हो क्या सकता है.

लड़का 18 का हो या 21 का कोई फर्क नहीं. उसकी जिंदगी में कोई जर्क नहीं. लेकिन भई लड़की को पढाया-लिखाया और फिर घर पर बिठाया.अगर चार दिन कहीं बाहर चली गई तो बादलों के पीछे छिपे रहने वाले चांद को बारे में नहीं पूछेंगे. चाहे दिन में सूरज 10 दिन तक न दिखे उसके बारे में चर्चा शुरु हो जाती है. और वो भी गली-गली

और वैसा ही आज भी स्वतंत्र देश की गुलाम लड़कियों के साथ होता है. 10 को अगर हम आजाद भारत में देखते हैं तो उनमें से 8 भी कड़े संघर्ष और दृढ़ निश्चय की देन हैं.  और 2या 3 ही आजादी की आदरणीय होती है.

अब मसला लड़कियों का है लड़की को यह रोना -रोना चाहिए. भई ऐसा बिल्कुल नहीं है. अच्छा आपने कभी गज़ल सुनी है. उसकी पंक्तियों को पढ़ा है,  किस तरह से गालिब ने उसको संजोया होता है, वैसे ही एक गज़ल को हम भी जानते हैं, और उस जैसी कई और भी गज़ल को हम जानते होंगे जो हमारे जीवन में अलग-अलग किरदार में मिली होंगी या मिलेंगी.

गजल न तो 18 साल की है और न ही 21 दोनों ही भारतीय कानून के जो भी प्रावधान है उससे ज्यादा उम्र की है 22 साल उसकी उम्र है. लेकिन आज भी वो आजादी की लड़ाई लड़ रही है. वो लड़ाई जो उसने सपने देखे हैं. जिन सपनो के हकीकत करने के लिए वो जी तोड़ मेहनत कर रही है. लेकिन आज भी शायद शाम को परिवार और समाजिक परिवेश में चार बातों का शिकार होना पड़ता है.

सुबह घर से निकलते वक्त मां का संदेशा होता होगा- बस में आराम से उतरना -चढ़ना. भाई का दुलार और पिता के दिल में एक चिंता की आग. सारा दिन यही ख्याल घूमता होगा जब भी गजल का ख्याल आता होगा. और हमारी गजल अब 8-10 घंटे घर से बाहर दुनिया को समझ रही है. दुनिया से तालमेल बनाने की कौशिश कर ही है. वो अकेली लड़की नहीं है ऐसी लाखों है. जो अपनी आजादी के लिए दुनिया से तालमेल मिला रही हैं.

पर वो अभी भी कनफ्यूज हैं वो आंटी जो सुबह रास्ते में मिले हैं. उनको  चिंता कैसी- जैस पाकिस्तान में आज भी यही पता नहीं कि पाकिस्तान को आजादी 14 अगस्त को मिली या 15 अगस्त को.  ठीक वैसे ही आंटी भी जितने मुंह उतनी बातों वाला किरदार निभा रही हैं. और रहेंगी. अब अंकुश कैसे लगेगा ये चलता ही रहेगा. So Just Ignore & Finally FUCK OFF जिसको जो बोलना है बोले जाओ... अब आजादी तो ऐसे आजाद देश में मिलने से रही. जहां सपनो को साकार करने से पहले भी हाथ जोड़ो..
सपनो के द्वार पर भी हाथ जोड़ो और बाद में भी हाथ जोड़ते रहो. क्योंकि भई सृजन जो करना है. और तब तक दिमाग में कीड़ा जन्म ले लेता है कि दोस्त क्या कहेंगे अगर जॉब छोडी, जो बनना है नहीं बन पाई, एंड ऑल दीज काइंड ऑफ फकिंग थिंग्स.
अब परिवार की भी चिंता है. रिश्तेदार की भी, अब हो गया है गजल को सारे समाज का ठेका, और अब ठेकेदार बन गई है, और सपना 50 फीसदी और 50 फीसदी रहा समाज-बाकि की उलझने.. ऐसे में सपनों को हकीकत का  रुप देना है. आजाद देश में गुलाम गजल .

अब गुलामी की जंजीरों को तोड़ना है और खुद से नाता जोेड़ना है तो खुद से खुश रहना सीखो. टारगेट करो अपने फॉक्स में ताकि परिवार के साथ अपना विकास हो सके. नहीं तो जुमले बाजी की राजनीति आजादी के बाद से खूब चली आ रही है. कोई आपको जाने या न जाने खुद को जाने और एक के बाद एक मंजिल को तय करो.
फिर बनों 21वीं सदी में आजाद देश की आजाद गजल , जवान गजल




वो अटल है, जो आज मौन है | #AtalBihariVajpayee #अटल_बिहारी_वाजपेयी | अटल बिहारी वाजपेयी

वो अटल है, जो आज मौन है
देश  फिर भी गूगल कर रहा
वो कौन है
वो अटल है, जो आज मौन है

चंद सांसे बाकि है अभी जिंदगी की
यम में भी दम नहीं अब
समझ गया है, जान गया
वो अटल है जो मौन है

सांस दर सांस खबर आ रही है
कहीं सच्ची, कहीं झूठी
की-बोर्ड से लिख
स्क्रीन पर फैलाई जा रही है

कहीं जिंदा इंसान को ही RIP
कहीं दुआओं की पंक्ति सजाई जा रही है
अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी
एक भाषण दे जाओ-
देश में गूंज दमदार आवाज की सुनाई जा रही है
आज हवा भी अलग ही धुन में गाए जा रही है

देर रात को चालाकी से चांद ने खुद देखा वो चेहरा
जिसे देखने के लिए सूरज के उजाले में
दुनिया आज गोते लगाए जा रही है
मोदी भी मायूस दिखे-
कुदरत करवट लेते हुए कुछ समझाए जा रही है

यहां बैठा सुनील समझ नहीं आ रहा
अलफाज वाक्य में हैं अटल
 जो रुह लिखाए जा रही है
फिर मौत आज आए या कल
बस- अंतिम सांसों में उलझन न आए
रुह जाकर प्रभु के चरणो से लिपट जाए
जिस्म ये मेरे गांव की माटी में मिल जाए

फिर साल में दो दफा ही तारीख पर पूछोगे
वो अब मौन नहीं, वो अटल कौन है
कुछ किस्से, कुछ बाते- किताबों में मिलेंगी
अटल को बताएगा गुगल कौन है....
जो....... 
अटल बिहारी वाजपेयी
 #AtalBihariVajpayee
#अटल_बिहारी_वाजपेयी 





मंगलवार, 14 अगस्त 2018

जिंदादिल इंसान भी डरता है सपने में दिखी उस रुह से

वो रात काफी अजीब थी, सुन सी हो गई थी रुह जब - खुली आंखों से भी देखा उसे , जो दिखी थी बंद आंखों से , होश में आने के बाद भी भुला नहीं पाई ....

हुआ कुछ ऐसा ही था. पता तब चला जब एक दिन सहमे हुए पन का कारण पूछा.  पता नहीं था असल जिंदगी में इतने परिवक्व किरदार का इंसान भी रात के अंधेरे में चलता है. लेकिन पल भर के लिए सहम सा जाता है जब उसे उस पल की याद आती है. और फिर उसे तलाश होती है ख्यालों में उस धुंधले हुए चहरे की जो कभी उसने देखा था. जिसके बाद शायद आत तक वो सो नहीं पाया है चैन से.

जी हां, वो इंसान जिससे जब हम बात किया करते हैं काफी हंसाता है. काफी जिंदगी को रंगीन बनाता है.  बुहत अच्छा ही कह सकता हूं दोस्त है या नहीं लिखे जाने तक तय नहीं. लेकिन इंसानी रुह अच्छी है. एक अपनापन सा है. जो जिंदगी के पटल पर कम ही लोगों को समझ आता है.

कहना शायद सही रहेगा- दिल में, दिमाग में हजारों परेशानियां है उनके लेकिन जुबान से कभी जाहिर नहीं. बातों ही बातों में बात होती है यह तो आपको भी पता है और अब हमें भी समझ आ ही गया.

उस दिन सब सही था रीतिका ने जितना बताया. अंदाजन दिनचर्या भी आम सी ही थी. जो रोजना हुआ करती है. शाम को परिवार में मां-पिता के साथ थोड़ी सी गप्पें मारी. खाना खाया, घर का बाकि काम उस दिन कम किया .मां ने ही कर दिया तो खुद के हाथों में मंहदी नहीं लगी थी, हां आजकल फोन अगर हाथों में है तो महंदी लगने से कम भी नहीं. बस फिर क्या था-

रुख कर लिया अपने महल की और- मतलब अपने कमरे की तरफ, मखमल के बिस्तर से कम नहीं जहां बचपन से आराम फरमाते आएं है. क्योंकि वक्त के हिसाब से उस कमरे और चारपाई के साथ कई यादें जुड़ी हुई हैं, जो भुलाए नहीं भुलती- और कभी तो ऐसे याद आती हैं, जैसे उस वक्त में ही बैठी हूं. फिर मंद सा हंस  कर वर्तमान में-

उस दिन भी ऐसा ही चल रहा था. उंगलियां मोेबाइल की स्क्रीन और दिमाग और कहीं लीन, अब क्या किया जाए. चल रहा है तो चल रहा. खुश थी. लेकिन भविष्य  का किसे पता था . पल भर में नींद आ गई. नींद में एक लड़की दिखाई दी . दरवाजे के बाहर खड़ी है और सफेद वस्त्र  धारण किए हुए है.  पल भर में नींद खुल गई . जैसे ही नींद खुली जो चेहरा नींद में दिखा था बंद आंखों से खुली आंखो से भी वही नजर आ रहा था. न आओ देखा-न ताओ. मैं उठी ऐसे तैसे हिम्मत गठजोड़ कर और सीधे  मां-पापा के कमरे के बाहर और जोर  उनको आवाज पर आवाज .

जैसे ही दरवाजा खुला- नो एंट्री जोन में जैसे कोई गाड़ी खुसाता हैः  वैसे सीधे अंदर, जो भी था .. पूछा भी गया कि क्या हुआ, जवाब था बस - सुबह बताउंगी. वो रात और आज तक जो भी रात आती है अगर गलती से भी ध्यान उस और चला जाए . खुदा कमस नींद नहीं आती ,

अब रीतिका को सच्ची कभी कभी नींद आने पर नींद नहीं आती. आज भी कमरे की बत्ती जलाकर सोती है. लेकिन जहन में जो डर भरा पड़ा है उसे निकालना तो होगा. उम्मीद है वक्त के हिसाब से डर घायब और हौंसला भर जाए, और जब भी जुबान पर जिक्र आए बस एक मीठी सी याद और खुशी देकर जाए.







शुक्रवार, 6 अप्रैल 2018

कहां तम चले गए, लाए गए 39 भारतीयों के अवशेष


एसीएसटी एक्ट को लेकर खूब बवाल हुआ. कई जगह हक के लिए हथियार भी हाथ में देखे गए. खूब हंगामा हुआ, कुछ लोगों को चिंता थी –जिनके घर के परिजन घर से बाहर थे. जब कोई अपना घर से बाहर होता है, तो इंतजार रहता है कि कब वापस आएगा. हर वक्त एक ही ख्याल रहता है. दरवाजे पर राह रहती है. कब डोर बैल वजेगी- अगर जरा सी ज्यादा देरी हो जाए तो फोन करके पूछ लिया जाता है, लेकिन अगर नंबर संपर्क में न आए तो दिल घबरा जाता है. हम लोग बार-बार नंबर डायल करने लगते हैं. और चिंता होती है. कि कहां होंगे- किस हाल में होंगे. अगर संपर्क में न भी हो पाए तब वक्त के हाथों मजबूर होकर इंतजार ही लाज्मी होता है. और ऐसा ही इंतजार कर रहे थे भारत के वो 39 परिवार जिनके अपनों से इराक में बददादी ने खूनी खेल खेला. और पहाड़ के नीचे उनकी उम्मीदों के साथ-उन्हे भी दफना दिया.


विदेश राज्यमंत्री वीके सिंह सोमवार दोपहर इराक से 38 भारतीयों के अवशेष लेकर भारत लौट आए। उनका स्पेशल प्लेन अमृतसर में लैंड हुआ। इससे पहले इराक में सिंह ने खुद विमान में ताबूतों को रखने में सहारा दिया। उन्होंने ट्वीट किया, कुछ जिम्मेदारियों का बोझ काफी ज्यादा होता है। बता दें कि इराक के मोसुल में आईएस ने 39 भारतीयों की हत्या कर दी थी, लेकिन एक का डीएनए पूरी तरह से मैच नहीं करने के चलते वहां से क्लीयरेंस नहीं मिली है। भारत लौटते ही वीके सिंह ने हैरान करने वाला बयान दिया है. उनके मुताबिक, इराक में जिन 39 भारतीयों को मार दिया गया है, वो अवैध तरीके से इराक गए थे.

भारत लौटे वीके सिंह ने इराक में मारे गए भारतीयाें के परिवारों को नौकारी देने की मांग पर कहा, "यह फुटबाल का खेल नहीं है। मामले को लेकर केंद्र और राज्य सरकार गंभीर हैं। नौकरी देने को लेकर विदेश मंत्रालय ने परिवारों से जानकारी मांगी है। हम उनका रिव्यू करेंगे।''

बता दें कि इराक में मारे गए लोगों के परिजन सरकार से नौकरी देने की मांग कर रहे हैं।

इराक के लिए कब रवाना हुए थे वीके सिंह?
1 अप्रैल को। इराक जाते वक्त उन्होंने कहा था, "वहां से आने के बाद पहले अमृतसर, फिर कोलकाता और फिर पटना जाकर उनके परिजनों को शव सौंपूंगा। इस बारे में मृतकों के परिजनों को सूचना दे दी गई है।"

किस जगह से भारत आए अवशेष?
अवशेषों को बगदाद एयरपोर्ट से भारत लाया गया। इराक में भारतीय राजदूत प्रदीप राजपुरोहित ने बताया कि अवशेषों को रविवार को ही भारतीय अफसरों को सौंप दिया गया।

किस विमान से लाए गए?
भारतीयों के अवशेष बोइंग सी-17 ग्लोबमास्टर से लाए गए। बता दें कि बोइंग सी-17 एक बड़ा मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट है।
अवशेषों को कहां-कहां ले जाया गया?
 मारे गए लोग पंजाब, हिमाचल, पश्चिम बंगाल और बिहार के थे। अवशेषों को उन्हीं के राज्य में सौंपा जाएगा। सुषमा ने कहा था कि मरने वालों में कोई दिल्ली का नहीं है, लिहाजा इराक से फ्लाइट दिल्ली नहीं आएगी।

केस पेंडिंग होने से एक शख्स के अवशेष नहीं मिलेंगे
- वीके सिंह ने कहा था, "हमें एक आदमी का शव केस पेंडिंग होने की वजह से नहीं मिलेगा। हम उसके परिवार को सबूतों के साथ ताबूत सौंप देंगे, जिससे उन्हें कोई शंका न रहे। मैं मारे गए लोगों के परिवारों के प्रति सहानुभूति व्यक्त करता हूं।''

आईएस ने मोसुल के बदूश में की थी हत्या
मारे गए कुछ लोगों के परिवारों ने 26 मार्च को विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से मुलाकात की थी. इस महीने, विदेश मंत्री ने संसद को बताया था कि आतंकी समूह आईएसआईएस ने जून 2014 में इराक के मोसूल से 40 भारतीयों का अपहरण कर लिया था लेकिन उनमें से एक खुद को बांग्लादेश का मुस्लिम बताकर भाग निकला था. उन्होंने कहा था कि बाकी 39 भारतीयों को बदूश ले जाया गया और उनकी हत्या कर दी गई.

आईएस के चंगुल से छूटे हरजीत मसीह
भारतीय मजदूरों के अपहरण के बाद आईएस ने 55 बांग्लादेशी मजदूरों को छोड़ दिया. इन लोगों के साथ मिलकर एक भारतीय हरजीत मसीह भी आईएस के चंगुल से बच निकलने में कामयाब रहा.

पहाड़ खोदकर निकाले गए 39 भारतीयों के शव
स्वराज के मुताबिक, जनरल वीके सिंह, भारतीय राजदूत और इराक के एक अफसर ने बलूच में जाकर लापता भारतीयों की खोज की. जहां, जानकारी मिली कि एक पहाड़ के नीचे कई शवों को एक साथ दफनाया गया है.स्वराज ने बताया कि मिली जानकारी के आधार पर डीप पेनिट्रेशन रडार के जरिए पहाड़ में दफनाए गए लोगों का पता लगाया गया. इसके बाद पहाड़ खोदकर सभी शव निकाले गए. शवों के साथ कुछ आईकार्ड और कुछ जूते मिले.

DNA से हुई शवों की पहचान
विदेश मंत्री ने कहा कि पहाड़ से जो शव मिले थे. उन पर विशेष ध्यान इसलिए भी था क्योंकि हमारे 39 लोग लापता थे और पहाड़ से जो शव बरामद हुए वो भी 39 ही थे. सुषमा ने बताया कि मार्टिअस फाउंडेशन ने शवों के साथ भेजे गए डीएनए का मिलान किया. इसमें सबसे पहला डीएनए संदीप नाम के लड़के का मिला. इसके बाद बाकी लोगों के भी डीएनए मिले.

20 मार्च को सुषमा स्वराज ने संसद और बाद में प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा- "जब हमें ये पता लगा कि टीले में कुछ शव हैं तो हमने इराक सरकार के साथ मिलकर डीप पेनिट्रेशन रडार से सच्चाई का पता लगाने का फैसला किया।" "जब ये पुख्ता हो गया कि इसमें शव हैं तो हमने उसकी खुदाई करवाई। जो शव मिले उन सभी का डीएनए टेस्ट कराया गया। 98 से 100% तक सैंपल मैच हो गए तो हमने संसद में इसकी जानकारी देना उचित समझा। जिसके बाद से भारतीय नागरिकों के अवशेष लाए जाने की हर संभव भारत के हुक्मरानों की तरफ से की जा रही थी. लिहाजा 39 में से 38 भारतीय नागरिकों के अवशेषों को लाया जा चुका है.

îŒãÃíÇíô Óíöµíöä Œôã ®í² ®ÕíÖíô×í ?
38 Óíöµíöä Ííôä Þíô 27 ÈíëºííËí, 4 îØâÍíí¸íÓí ÈíþÅôÖí, 2 ÈíîÖ¸í ËíëµííÓí ®÷Ðâ 6 îËíØâíÐâ Œôã Øõäâ
²Œã Œãí ¿âï²Çí² ÞíõäÈíÓí Ííõ¸í Œãï Èíðî×½â ÇíØâïä Øðâ¯ýâ Øõâ
ÞíïîÐâÎíÓí ÇíëËíÐâ                 ÍíòÃíŒã Œãí ÇííÍí                         ÐâíºÎí  (ÖíØâÐâ) 
1                                  ŒãÍíÓíºíïÃí îÞíëØâ                  ÈíëºííËí  (ØâöîÖíÎííÐâÈíðÐ)â
2                                  µíðÐâÅïÈí îÞíëØâ                       ÈíëºííËí  (ØâöîÖíÎííÐâÈíðÐ)â
3                                  îÇíÖííÇí îÞíëØâ                           ÈíëºííËí  (®ÍíòÃíÞíÐâ)â
4                                 ÍíÇíîºíÇ« îÞíëØâ                     ÈíëºííËí  (®ÍíòÃíÞíÐâ)â
5                                 ºíîÃíÇ« îÞíëØâ                         ÈíëºííËí  (®ÍíòÃíÞíÐâ)â
6                                 ØâÐâîÞíÍíÐâÇíºíïÃí îÞíëØâ                ÈíëºííËí  (®ÍíòÃíÞíÐâ)â
7                              µíðÐâ¸íÐâÁí îÞíëØâ                             ÈíëºííËí  (®ÍíòÃíÞíÐâ)â
8                               ÞíöÇíñ                                      ÈíëºííËí  (®ÍíòÃíÞíÐâ)â
9                                ÐëâºíïÃí îÞíëØâ                            ÈíëºííËí  (®ÍíòÃíÞíÐâ)â
10                             ŒãëÕíÓíºíïÃí îÞíëØâ                           ÈíëºííËí  (Ëí½âíÓíí)â
11                                  ØâÐâïÖí ŒðãÍííÐâ                             ÈíëºííËí  (Ëí½âíÓíí)â
12                                 ÍíÓíŒãïÃí îÞíëØâ                           ÈíëºííËí  (Ëí½âíÓíí)â
13                                  ÐâíŒãôÖí                                  ÈíëºííËí  (µíðÐâÅíÞíÈíðÐâ )â
14                                 ÆíÍíôœ« ŒðãÍííÐâ                               ÈíëºííËí  (µíðÐâÅíÞíÈíðÐâ )â
15                                µíîÕíÇ« îÞíëØâ                              ÈíëºííËí  (ŒãÈíñÐâÄíÓíí)â
16                                 ËíÓíÕíëÃí ÐâíÎíâ                                ÈíëºííËí  (ºííÓíëÆíÐ)â
17                                  ŒðãÓíîÕíë« îÞíëØâ                                ÈíëºííËí  (ºííÓíëÆíÐ)â
18                                 ÑãÈíÓííÓíâ                              ÈíëºííËí  (ºííÓíëÆíÐ)â
19                                  ÞíðÐâºíïÃí îÞíëØâ                       ÈíëºííËí  (ºííÓíëÆíÐ)â
20                                  ÅîÕíÇ« îÞíëØâ                                  ÈíëºííËí  (ºííÓíëÆíÐ)â
22                                ÐâîÕíë« ŒðãÍííÐâ                                ÈíëºííËí  (ºííÓíëÆíÐ)â
23                                ÈíþïÃíÈííÓí  ÖíÍííýâ                                 ÈíëºííËí  (ÆíñÐâï )â
24                                ÈíÐâîÍíëÅÐâ ŒðãÍííÐâ                                 ÈíëºííËí  
25                                ËíÓíÕíïÐâ ¸íëÅ                                     ÈíëºííËí 
26                                ÞíðÐâºíïÃí ÍíõäŒãí                               ÈíëºííËí  
27                                ÇíëÅ ÓííÓíâ                                       ÈíëºííËí                         
28                          ®ÍíÇí ŒðãÍííÐâ                                  îØâÍíí¸íÓí ÈíþÅôÖí
29                         ÞíëÅïÈí îÞíëØâ ÐâíÁííâ                              îØâÍíí¸íÓí ÈíþÅôÖí
30                          ¯ëâÅÐâºíïÃíâ                                      îØâÍíí¸íÓí ÈíþÅôÖí
31                           ØôâÍíÐâíºí                                      îØâÍíí¸íÓí ÈíþÅôÖí
32                                ÞíÍíÐâ ½âïŒãíÅíÐâ                           ÈíîÖ¸íÍí ËíëµííÓí 
33                                ´íö´íÇí îÞíŒãÅÐâ                           ÈíîÖ¸íÍí ËíëµííÓí 
34                                ÞíëÃíö×í ŒðãÍííÐââ                           ÈíîÖ¸íÍí ËíëµííÓí 
35                              îËíëÆÎíÌíñ×íÁí îÃíÕííÐâï                     îËíØâíÐâ 
36                               ®ÅíÓíÃí îÞíëØâ                           îËíØâíÐâ
37                              ÞíðÇíïÓí Œð ÍííÐâ ŒðãÖíÕííØâí                 îËíØâíÐâ
38                            ÆíÍíôœÅÐâ ŒðãÍííÐâ                              îËíØâíÐâ
39                            Ðâíºíñ ŒðãÍííÐâ ÎííÅÕí  â                          îËíØâíÐâ (DNA ŒãÇÉãÍíý ÇíØâïä Øðâ®í)




जो इस दुनिया से सालों पहले चला गया--- उसके लौटने का रहता था सिर्फ इंतजार--- थी बाकि उसके जिंदा होने की उम्मीद--- इससे तकलीफ देह आज क्या होगा- जब इन लोगों ने अपनों के अवशेषों को देखना नसीब हुआ—जिनका आखिरी बार ये चहरा भी नहीं देख पाए.... देश के 39 परिवार इसी उम्मीद में जी रहे थे कि एक दिन उनका बेटा वापिस आएगा. उनके अपने वतन वापस लौट आएंगे ...


लेकिन ऐसा नहीं हुआ—यह तस्वीर पंजाब से करीब साढे तीन हजार किलोमीटर की दूरी से आज भारत आ पहुंचे शवों के अवशेषों की है. यह तस्वीर उन लोगों की है जिन्हे चार साल पहले मार कर दफन कर दिया गया. बीते चार साल में शवों के अवशेष भी मिट्टी में मिट्टी होने लगे थे. लेकिन चार सालों तक ये अवशेष – 39 परिवारों के लिए जिंदा इंसान बने रहे. चार साल से इनके परिवार के लोग इनकी वापसी का इंतजार करते रहे..

कोई मां अपने बेटे का इंतजार कर रही थी. कोई बाप अपने बुढ़ापे के सहारे के राह देख रहा था...... कोई बहन अपनी राखी के लिए रक्षा का वचन देने वाले भाई की बाजु ढूंढ रही थी.....  तो कोई पत्नी अपने पति का इंतजार कर रही थी...  किसी बच्चे को पापा का इंतजार था...

लेकिन उन्हे क्या मालूम था कि जिसका उन्होने चार साल इंतजार किया उसका उन्हे चेहरा भी देखना नसीब नहीं होगा... बस इतनी सी महर रव की रही कि अब पूरे रिती रिवाज से वक्त ने अंतिम संस्कार तय कर दिया. लेकिन वक्त भी इन परिवारों से बफा न कर पाया. वो तो गए थे इराक रोजी रोटी की तलाश में लेकिन वहां बगदादी उनके खून का प्यासा हो गया,